
भारत सरकार द्वारा देश में कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करने और पर्यावरण को सुरक्षित रखने के लिए पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने की महत्वाकांक्षी योजना शुरू की गई थी। इसके तहत देश भर में E20 पेट्रोल यानी 20 प्रतिशत इथेनॉल और 80 प्रतिशत पेट्रोल के मिश्रण को तेजी से लागू करने का लक्ष्य रखा गया था। हालांकि, जैसे-जैसे यह योजना धरातल पर उतर रही है, इसके सामने कई गंभीर तकनीकी और व्यावहारिक परेशानियां खड़ी हो गई हैं। वर्तमान स्थिति यह है कि एक तरफ तो देश की डिस्टिलरीज और चीनी मिलों द्वारा उत्पादित इथेनॉल की खपत उतनी तेजी से नहीं हो पा रही है जितनी उम्मीद की गई थी, और दूसरी तरफ उच्च मिश्रण वाले ईंधन यानी E25 और E30 के प्रस्तावों पर फिलहाल ब्रेक लगता हुआ दिखाई दे रहा है। इस पूरी स्थिति ने ऊर्जा क्षेत्र और ऑटोमोबाइल बाजार में एक नई हलचल पैदा कर दी है, जिससे नीति निर्माताओं से लेकर वाहन चालकों तक की चिंताएं बढ़ गई हैं।
जब देश में E20 पेट्रोल को चरणबद्ध तरीके से लॉन्च किया गया था, तब यह माना जा रहा था कि इससे देश का विदेशी मुद्रा भंडार बचेगा और किसानों को भी उनकी फसल का उचित मूल्य मिलेगा। लेकिन जमीनी स्तर पर तस्वीर कुछ और ही बयां कर रही है। देश के कई हिस्सों में उपभोक्ताओं और पेट्रोल पंप संचालकों के बीच यह चर्चा आम हो गई है कि अधिक इथेनॉल मिश्रण वाले पेट्रोल से गाड़ियों के इंजन के प्रदर्शन पर असर पड़ रहा है। कई पुरानी गाड़ियों के इंजन और फ्यूल पंप्स में इथेनॉल के रासायनिक गुणों के कारण खराबी आने की शिकायतें सामने आई हैं। इसके अलावा, माइलेज में थोड़ी गिरावट आने की वजह से आम वाहन चालक भी इसे लेकर पूरी तरह से सहज नहीं हो पा रहे हैं। यही कारण है कि ऑयल मार्केटिंग कंपनियों को पेट्रोल पंपों पर इथेनॉल-ब्लेडिट फ्यूल की बिक्री को सुचारू रूप से चलाने में कई प्रकार की लॉजिस्टिक और मांग से जुड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
सरकार और ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री का शुरुआती लक्ष्य था कि E20 के बाद देश को तेजी से E25 और E30 की ओर ले जाया जाए, ताकि जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता को और अधिक घटाया जा सके। लेकिन E20 के क्रियान्वयन में आ रही व्यावहारिक कठिनाइयों और ऑटोमोबाइल निर्माताओं की आपत्तियों के बाद इन उच्च मिश्रण वाले लक्ष्यों पर फिलहाल ब्रेक लगा दिए गए हैं। कार और दोपहिया वाहन निर्माताओं का कहना है कि वर्तमान में भारतीय सड़कों पर दौड़ने वाले अधिकांश वाहन केवल E20 तक के मिश्रण को ही सहन करने के लिए डिजाइन किए गए हैं। यदि बिना पर्याप्त तकनीकी बदलाव और मजबूत इंजन के E25 या E30 जैसा अत्यधिक इथेनॉल युक्त ईंधन बाजार में उतार दिया जाए, तो गाड़ियों के पार्ट्स जल्दी खराब हो सकते हैं और इंजन की उम्र घट सकती है। इसी तकनीकी और सुरक्षात्मक पहलू को ध्यान में रखते हुए फिलहाल उच्च मिश्रण के नियमों को होल्ड पर रखा गया है, ताकि वाहन मालिकों को किसी बड़े नुकसान का सामना न करना पड़े।
इथेनॉल मिश्रण के इस पूरे खेल में सबसे बड़ा झटका उन चीनी मिलों और डिस्टिलरी इकाइयों को लगा है जिन्होंने सरकार के आह्वान पर भारी-भरकम निवेश करके इथेनॉल उत्पादन क्षमता में बंपर बढ़ोतरी की थी। भारत में गन्ने के रस और टूटे हुए चावल से भारी मात्रा में इथेनॉल का उत्पादन किया जा रहा है, लेकिन पेट्रोल में इसकी खपत की रफ्तार उम्मीद के मुताबिक न होने के कारण मिलों के सामने स्टोरेज और कैश फ्लो का संकट खड़ा होने लगा है। यदि इथेनॉल की बिक्री में इसी तरह सुस्ती बनी रही, तो गन्ना किसानों के बकाए भुगतान पर भी इसका नकारात्मक असर पड़ सकता है। उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार और तेल कंपनियों को मिलकर इस मांग और आपूर्ति के असंतुलन को जल्द से जल्द दूर करना होगा, अन्यथा ग्रीन एनर्जी का यह पूरा मॉडल अपनी गति खो सकता है।
पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण के मोर्चे पर आ रही इन तमाम जटिलताओं और अड़चनों के बाद अब नीति निर्माताओं और ऊर्जा विशेषज्ञों की नजरें देश के परिवहन क्षेत्र के दूसरे सबसे बड़े ईंधन यानी डीजल पर टिक गई हैं। भारत में कुल ईंधन खपत का एक बड़ा हिस्सा डीजल से चलता है, विशेषकर कमर्शियल गाड़ियां, ट्रक, बसें और कृषि उपकरण डीजल पर ही आधारित हैं। ऐसे में सरकार अब डीजल में बायोडीजल और अन्य वैकल्पिक ईंधनों के मिश्रण को बढ़ावा देने की रणनीतिक दिशा में तेजी से विचार कर रही है। हालांकि, डीजल में मिश्रण करना पेट्रोल की तुलना में अधिक तकनीकी चुनौतियां पैदा करता है, लेकिन कच्चे तेल के आयात बिल को कम करने के लिए यह एक अनिवार्य विकल्प बनता जा रहा है। आने वाले समय में देखना यह होगा कि सरकार डीजल और बायोडीजल के इस नए समीकरण को किस प्रकार संभालती है और क्या यह देश के ऑटोमोटिव सेक्टर के लिए राहत लेकर आएगा या नई मुश्किलें खड़ी करेगा।
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