इतिहास की साझी विरासत से वर्तमान की नई चुनौतियों तक: भारत-बांग्लादेश संबंधों का नया मोड़

भारत और बांग्लादेश के बीच के संबंध केवल दो पड़ोसी मुल्कों की औपचारिक कूटनीति तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह 1971 के मुक्ति संग्राम (Liberation War) के साझा बलिदान, भाषा, संस्कृति, भौगोलिक निकटता और 4,096 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा से बंधे हैं। 1971 में बांग्लादेश के जन्म के समय भारत द्वारा निभाई गई ऐतिहासिक भूमिका ने दोनों देशों के बीच एक अटूट रणनीतिक साझेदारी की नींव रखी थी। पिछले डेढ़ दशक में दोनों देशों के रिश्तों को कूटनीति की भाषा में ‘सोनाली अध्याय’ (स्वर्णिम अध्याय) कहा गया, जिसके दौरान 2015 का ऐतिहासिक भूमि सीमा समझौता (LBA), समुद्री सीमा विवाद का शांतिपूर्ण समाधान और पूर्वोत्तर राज्यों को जोड़ने वाले विशाल रेल-सड़क कनेक्टिविटी नेटवर्क का विस्तार हुआ।

अगस्त 2024 में ढाका में हुए बड़े राजनीतिक उथल-पुथल और तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना के भारत में शरण लेने के बाद द्विपक्षीय संबंधों में कई अप्रत्याशित कूटनीतिक असहजताएं और जटिलताएं देखने को मिलीं। ढाका में शासन परिवर्तन के बाद से ही दोनों पक्षों के बीच अविश्वास की खाई को पाटने, जन-केंद्रित विदेश नीति को बहाल करने और रणनीतिक संवाद को पटरी पर लाने के लिए बैक-चैनल और प्रत्यक्ष राजनयिक प्रयास लगातार जारी हैं। भारत की ‘नेबरहुड फर्स्ट’ (पड़ोसी प्रथम) और ‘एक्ट ईस्ट’ नीति के केंद्र में बांग्लादेश की केंद्रीय भूमिका आज भी उतनी ही अपरिहार्य बनी हुई है जितनी पहले थी।

दिसंबर 2026 में गंगा जल संधि का 30-वर्षीय नवीनीकरण: नदी जल कूटनीति की सबसे बड़ी परीक्षा

भारत और बांग्लादेश के बीच 54 ऐसी नदियां हैं जो दोनों देशों की सीमाओं को पार करती हैं। इनमें सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण विषय ऐतिहासिक ‘गंगा जल संधि’ (Ganga Water Sharing Treaty 1996) का नवीनीकरण है। वर्ष 1996 में 30 वर्षों की अवधि के लिए हस्ताक्षरित यह ऐतिहासिक संधि दिसंबर 2026 में समाप्त हो रही है। पश्चिम बंगाल के फरक्का बैराज पर जल के प्रवाह के बंटवारे को निर्धारित करने वाली इस संधि के भविष्य पर दोनों देशों के लाखों किसानों और पर्यावरणीय स्थिरता की निर्भरता है।

गंगा जल समझौते के अतिरिक्त, उत्तर बंगाल और बांग्लादेश के उत्तरी जिलों के बीच बहने वाली ‘तीस्ता नदी’ (Teesta River) का जल बंटवारा दशकों से एक अनसुलझा राजनीतिक व रणनीतिक मुद्दा रहा है। पश्चिम बंगाल सरकार की आपत्तियों के चलते 2011 में तीस्ता समझौते पर अंतिम मुहर नहीं लग सकी थी। वर्तमान में तीस्ता नदी पुनरुद्धार और प्रबंधन परियोजना में चीन की बढ़ती दिलचस्पी ने नई दिल्ली के रणनीतिक हलकों में सुरक्षा संबंधी चिंताएं पैदा की हैं, जिसके कारण भारत ने इस क्षेत्र में तकनीकी और वित्तीय सहयोग की समानांतर पहल की है।

सुरक्षा, सीमा प्रबंधन और ‘सिलीगुड़ी कॉरिडोर’ की भू-राजनीतिक संवेदनशीलता

भारत और बांग्लादेश दुनिया की पांचवीं सबसे लंबी थल सीमा साझा करते हैं। सीमा सुरक्षा बल (BSF) और बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश (BGB) के बीच समन्वय सीमा पर शांति बनाए रखने का मुख्य आधार है:

  • सीमा पार अवैध घुसपैठ और तस्करी पर रोक: असम, मेघालय, त्रिपुरा, मिजोरम और पश्चिम बंगाल से सटी सीमा पर अवैध प्रवासियों की आवाजाही, पशु तस्करी और जाली भारतीय मुद्रा (FICN) के नेटवर्क को ध्वस्त करने के लिए रियल-टाइम इंटेलिजेंस शेयरिंग जरूरी है।

  • पूर्वोत्तर उग्रवाद पर निगरानी: भारत के लिए यह अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है कि बांग्लादेश की धरती का इस्तेमाल उल्फा (ULFA) या नगा चरमपंथी समूहों जैसे भारत-विरोधी तत्वों द्वारा सुरक्षित पनाहगाह के रूप में न किया जा सके।

  • सिलीगुड़ी कॉरिडोर (चिकन नेक) की सुरक्षा: उत्तर बंगाल का यह संकरा 22 किलोमीटर चौड़ा गलियारा मुख्य भारत को पूर्वोत्तर के आठ राज्यों से जोड़ता है। बांग्लादेश के लालमोनिरहाट और उत्तरी क्षेत्रों में किसी भी तीसरे देश (विशेषकर चीन) की सैन्य या निगरानी मौजूदगी भारत के इस संवेदनशील कॉरिडोर के लिए सीधा रणनीतिक जोखिम मानी जाती है।

व्यापार, पारगमन और ऊर्जा सहयोग: दक्षिण एशिया में भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार

आर्थिक दृष्टिकोण से बांग्लादेश दक्षिण एशिया में भारत का सबसे बड़ा और वैश्विक स्तर पर पांचवां सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है। दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार का आकार 14 से 16 अरब डॉलर के स्तर पर बना हुआ है। भारत बांग्लादेश को कच्चा कपास, पेट्रोलियम उत्पाद, बिजली, अनाज और मशीनरी का निर्यात करता है, जबकि बांग्लादेश से तैयार वस्त्र (Readymade Garments), जूट उत्पाद और चमड़े का आयात किया जाता है।

दोनों देशों के बीच बुनियादी ढांचा और कनेक्टिविटी सहयोग कई प्रमुख स्तंभों पर टिका है:

  • बंदरगाह पारगमन (Transit Access): बांग्लादेश के चटगाँव और मोंगला बंदरगाहों के जरिए भारतीय मालवाहक जहाजों को असम, त्रिपुरा और मेघालय तक माल पहुंचाने की ट्रांजिट सुविधा से पूर्वोत्तर राज्यों की लॉजिस्टिक्स लागत और समय में भारी कमी आई है।

  • रेल और सड़क संपर्क: अगरतला-अखाउरा रेल लिंक, पेट्रापोल-बेनापोल इंटीग्रेटेड चेक पोस्ट (ICP), और मैत्री सेतु (सबरूम-रामगढ़) ने दोनों देशों के बीच व्यापारिक आवागमन को अभूतपूर्व गति दी है।

  • ऊर्जा और ग्रिड कनेक्टिविटी: भारत द्वारा 1,100 मेगावाट से अधिक बिजली की आपूर्ति और भारत-बांग्लादेश मैत्री पाइपलाइन (IBFP) के जरिए असम की नुमालीगढ़ रिफाइनरी से बांग्लादेश के पारबतीपुर डिपो तक हाई-स्पीड डीजल का परिवहन निर्बाध ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करता है।

कूटनीतिक पेच: शेख हसीना का प्रत्यर्पण, आंतरिक राजनीति और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा

ढाका में राजनीतिक बदलाव के बाद दोनों देशों के कूटनीतिक रिश्तों में कुछ तीखे विवाद भी सामने आए हैं। बांग्लादेश के वर्तमान प्रशासन और वहां की अदालतों द्वारा पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के खिलाफ दर्ज मामलों के आधार पर उनके औपचारिक प्रत्यर्पण (Extradition) की मांग उठाई जा रही है। वर्ष 2013 की भारत-बांग्लादेश प्रत्यर्पण संधि (Extradition Treaty) में राजनीतिक अपराधों और मानवीय आधारों से जुड़े विशिष्ट अपवाद शामिल हैं, जिसके चलते यह मसला दोनों देशों के बीच एक अत्यंत जटिल कानूनी व कूटनीतिक गतिरोध बना हुआ है।

इसके साथ ही, भारत ने बांग्लादेश में हिंदू, बौद्ध और ईसाई अल्पसंख्यक समुदायों के जान-माल और धार्मिक स्थलों की सुरक्षा को लेकर अपनी गंभीर मानवीय चिंताएं लगातार राजनयिक स्तर पर उठाई हैं। भारत का आधिकारिक रुख स्पष्ट रहा है कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया, कानून का शासन और अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा एक स्थिर और सुरक्षित पड़ोस के लिए अनिवार्य पूर्वशर्तें हैं।

वैश्विक शक्तियों का त्रिकोण: चीन-पाकिस्तान का प्रभाव और भारत की रणनीति

बांग्लादेश की रणनीतिक अवस्थिति बंगाल की खाड़ी के शीर्ष पर है, जो हिंद-प्रशांत क्षेत्र (Indo-Pacific) का एक प्रमुख समुद्री मार्ग है। हाल के समय में बीजिंग ने बांग्लादेश में अपने ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ (BRI) के तहत बुनियादी ढांचा परियोजनाओं, गहरे समुद्र बंदरगाहों (पायरा और कॉक्स बाजार) और रक्षा आपूर्ति के जरिए अपना प्रभाव बढ़ाने की पुरजोर कोशिश की है। वहीं पाकिस्तान के साथ भी समुद्री और कूटनीतिक संपर्कों में आई तेजी क्षेत्रीय संतुलन के लिहाज से महत्वपूर्ण हो गई है।

भारत इस रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का मुकाबला किसी टकराव के बजाय पारदर्शी विकास सहायता, तेज क्रियान्वयन और बहुपक्षीय मंचों—जैसे बिम्सटेक (BIMSTEC), सार्क (SAARC) और BBIN (भूटान-बांग्लादेश-भारत-नेपाल मोटर वाहन समझौता)—के जरिए अधिक व्यावहारिक और टिकाऊ विकल्प देकर कर रहा है। भारत की नीति यह सुनिश्चित करने की है कि बांग्लादेश की विदेश नीति किसी एक गुट के प्रभाव में न आकर क्षेत्रीय संतुलन और संप्रभु प्राथमिकताओं पर आधारित रहे।

आगे की राह: व्यावहारिक कूटनीति और जन-केंद्रित साझेदारी का निर्माण

भूगोल को बदला नहीं जा सकता; भारत और बांग्लादेश एक-दूसरे के विकास, सुरक्षा और आर्थिक समृद्धि के लिए परस्पर निर्भर हैं। आने वाले समय में दोनों देशों के रिश्तों की दिशा इस बात पर निर्भर करेगी कि वे संवेदनशील राजनीतिक मुद्दों से अलग हटकर व्यावहारिक हितों को कितनी प्राथमिकता देते हैं।

1996 की गंगा जल संधि पर समय रहते सहमति बनाना, व्यापारिक बाधाओं को दूर करने के लिए प्रस्तावित ‘व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते’ (CEPA) पर बातचीत को आगे बढ़ाना, और दोनों देशों के युवाओं, छात्रों, व्यापारियों और मेडिकल पर्यटकों के लिए वीजा प्रक्रियाओं को सरल बनाना द्विपक्षीय विश्वास को दोबारा सुदृढ़ कर सकता है। नई दिल्ली और ढाका के बीच एक खुला, परिपक्व और पारदर्शी संवाद ही दक्षिण एशिया में स्थायी शांति और साझा आर्थिक प्रगति की सबसे मजबूत गारंटी साबित होगा।