
भारतीय सिनेमा के इतिहास में जब भी सनातन संस्कृति, महाकाव्यों और धार्मिक चरित्रों को रूपहले पर्दे पर उतारने की बात होती है, तो दर्शकों की भावनाएं सीधे तौर पर उससे जुड़ जाती हैं। वर्तमान दौर में जब नितेश तिवारी के निर्देशन में बन रही और अभिनेता रणबीर कपूर के मुख्य अभिनय से सजी बहुचर्चित फिल्म ‘रामायण’ के सिनेमाघरों में दस्तक देने का समय बेहद नजदीक आ चुका है, ठीक उसी संवेदनशील घड़ी में टीवी के सबसे लोकप्रिय सुपरहीरो ‘शक्तिमान’ और बी.आर. चोपड़ा की ऐतिहासिक ‘महाभारत’ में ‘भीष्म पितामह’ का अमर किरदार निभाने वाले वरिष्ठ अभिनेता मुकेश खन्ना ने फिल्म इंडस्ट्री के सबसे संवेदनशील मुद्दे पर खुला मोर्चा खोल दिया है। हमेशा अपनी स्पष्टवादिता और बिना लाग-लपेट के खरी-खरी बात रखने के लिए जाने जाने वाले मुकेश खन्ना ने बॉलीवुड बबल को दिए एक विस्फोटक इंटरव्यू में बिना किसी का प्रत्यक्ष नाम लिए पौराणिक और ऐतिहासिक फिल्मों की कास्टिंग प्रक्रिया की जड़ों को हिलाकर रख दिया है। उन्होंने दो टूक शब्दों में चेतावनी देते हुए कहा है कि फिल्ममेकर्स को यह समझना होगा कि माइथोलॉजिकल प्रोजेक्ट्स कोई सामान्य मसाला फिल्में नहीं हैं, बल्कि यह देश के करोड़ों सनातनी श्रद्धालुओं की आस्था और आत्मा से जुड़ा विषय है, जहां किसी भी प्रकार का हल्कापन या व्यावसायिक समझौता अक्षम्य है।
मुकेश खन्ना का यह बयान ऐसे समय में आया है जब पूरा सोशल मीडिया और सिनेजगत रणबीर कपूर के भगवान श्री राम के अवतार में अवतरित होने को लेकर बंटा हुआ है। एक बड़ा वर्ग जहां अभिनेता की अभिनय क्षमता को लेकर आशान्वित है, वहीं दूसरा वर्ग उनकी पिछली छवि और व्यक्तिगत जीवनशैली को लेकर लगातार सवाल उठा रहा है। इस पूरी बहस के बीच मुकेश खन्ना ने फिल्म उद्योग की उस दुखती रग पर हाथ रख दिया है, जिसकी तरफ आमतौर पर बड़े निर्माता-निर्देशक आंखें मूंदे रहते हैं। खन्ना ने साफ किया कि आज की तारीख में बॉलीवुड का सबसे बड़ा संकट यह है कि वहां किसी भी ऐतिहासिक या दैवीय चरित्र के लिए अभिनेता के चेहरे की दिव्यता, उसके आभामंडल, उसकी शारीरिक भाषा या उसके नैतिक प्रभाव को नहीं देखा जाता, बल्कि केवल और केवल उसके पिछले शुक्रवार के बॉक्स-ऑफिस कलेक्शन और सोशल मीडिया फॉलोअर्स की संख्या के आधार पर निर्णय लिए जा रहे हैं।
इंडस्ट्री के आर्थिक गणित और कॉरपोरेट कार्यप्रणाली का पर्दाफाश करते हुए मुकेश खन्ना ने कहा कि आज के दौर में निर्माता किसी किरदार के लिए सही चेहरे का चयन करने की जहमत ही नहीं उठाते। उन्होंने अपनी बात रखते हुए कहा कि मैं किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं बोलना चाहता क्योंकि सच बोलने पर लोग अक्सर बुरा मान जाते हैं, लेकिन कड़वी सच्चाई यही है कि हमारे आज के फिल्म निर्माता बड़े ऐतिहासिक और पूजनीय किरदारों की कास्टिंग को लेकर बिल्कुल भी गंभीर या सतर्क नहीं हैं। वे बिना सोचे-समझे केवल ऐसे अभिनेताओं को साइन कर लेते हैं जिनकी पिछली फिल्म बॉक्स-ऑफिस पर बहुत बड़ी हिट साबित हुई हो। निर्माताओं को लगता है कि उस स्टार का चेहरा पोस्टर पर चिपका देने से उनका 300 करोड़ रुपये का बजट पहले ही सुरक्षित हो जाएगा।
मुकेश खन्ना ने इस कॉरपोरेट मानसिकता पर तीखा तंज कसते हुए समझाया कि मेकर्स यह भूल जाते हैं कि वे 300 करोड़ की लागत तो पहले दिन ही डिजिटल राइट्स बेचकर निकाल लेते हैं, लेकिन गलत चेहरे की वजह से जो 700 करोड़ रुपये का विशाल जनसमर्थन और बॉक्स-ऑफिस इतिहास रचा जा सकता था, वह उनके हाथ से पूरी तरह फिसल जाता है। उन्होंने कहा कि आज स्थिति यह हो चुकी है कि फिल्म बनने से बहुत पहले ही नेटफ्लिक्स और अमेजन प्राइम जैसे बड़े ओटीटी प्लेटफॉर्म्स से करोड़ों की डील्स लॉक कर ली जाती हैं। पैसे पहले ही जेब में आ जाते हैं, स्क्रिप्ट बाद में लिखी जाती है और फिल्म की शूटिंग के दौरान ही यह साफ दिखने लगता है कि स्क्रीन पर जो अभिनेता या अभिनेत्री खड़ी है, वह उस पूजनीय चरित्र के 10 प्रतिशत भी योग्य नहीं है। यह केवल एक व्यापारिक हेराफेरी है, जिसमें कला और आस्था दोनों की बलि चढ़ा दी जाती है।
एक अनुभवी निर्माता और अभिनेता के रूप में अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए मुकेश खन्ना ने हिंदी फिल्म उद्योग के अंदरूनी सत्ता संतुलन में आए विकृत बदलावों पर खुलकर प्रहार किया। उन्होंने कहा कि मैं यह बातें इतनी मजबूती से इसलिए कह पाता हूं क्योंकि मैं खुद एक फिल्म निर्माता रह चुका हूं और मैंने सिनेमा के स्वर्गीय दौर को बेहद करीब से देखा है। आज के बॉलीवुड का कड़वा सच यह है कि यहां निर्देशक या निर्माता किसी अभिनेता को कास्ट नहीं करते, बल्कि ऐसा लगता है मानो बड़ा अभिनेता अपनी मर्जी से निर्माता को कास्ट कर रहा हो। स्टार्स का अहंकार इतना बढ़ चुका है कि वे खुद तय करते हैं कि उन्हें कौन सा भगवान बनना है, कौन सा ऐतिहासिक योद्धा बनना है और पूरी प्रोडक्शन यूनिट उनके आगे नतमस्तक हो जाती है। केवल इसलिए कि फलां स्टार बिक रहा है, उसे उठाकर किसी भी पावन सिंहासन पर बैठा दिया जाता है।
मुकेश खन्ना ने इस दौरान एक बेहद बुनियादी लेकिन अनदेखा सवाल उठाया कि आखिर बॉलीवुड में स्थापित और बड़े सितारों का कभी स्क्रीन टेस्ट या विधिवत ऑडिशन क्यों नहीं लिया जाता? हॉलीवुड का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि दुनिया के सबसे बड़े ऑस्कर विजेता कलाकारों को भी किसी पौराणिक या ऐतिहासिक चरित्र को निभाने से पहले दर्जनों ऑडिशन्स, बॉडी लैंग्वेज टेस्ट और डिक्शन ट्रेनिंग से गुजरना पड़ता है। लेकिन भारत में अगर किसी स्टार की पिछली फिल्म ने 500 करोड़ कमा लिए, तो सीधे मान लिया जाता है कि वह भगवान श्री राम, महादेव या महाभारत के किसी भी महारथी का रोल बिना किसी तैयारी के कर सकता है। ऑडिशन कल्चर को खत्म कर देना ही बॉलीवुड की अधिकांश माइथोलॉजिकल फिल्मों के फ्लॉप और हास्यास्पद होने की सबसे बड़ी वजह है।
कास्टिंग की उपयुक्तता पर विस्तार से समझाते हुए मुकेश खन्ना ने शाहरुख खान और प्रभास का उदाहरण देकर स्थिति को बिल्कुल शीशे की तरह साफ किया। उन्होंने कहा कि मैं यह बात बहुत पहले भी सार्वजनिक रूप से कह चुका हूं कि शाहरुख खान एक बेहतरीन अभिनेता हो सकते हैं, लेकिन वे कभी भी शक्तिमान नहीं दिख सकते। शाहरुख की अपनी एक स्थापित रोमांटिक और अर्बन इमेज है जिसे दर्शक दशकों से देखते आ रहे हैं। अगर आप उन्हें उठाकर शक्तिमान के परिधान में खड़ा कर देंगे, तो दर्शक उसे कभी स्वीकार नहीं करेंगे। उन्होंने फिल्मकारों को नसीहत दी कि कास्टिंग डायरेक्टर को समय लेना चाहिए, कमर्शियल पहलुओं और स्टार पावर से आगे बढ़कर यह सोचना चाहिए कि क्या वह चेहरा उस भूमिका की आत्मा के साथ न्याय कर पाएगा।
इसके तुरंत बाद मुकेश खन्ना ने ओम राउत की विवादित फिल्म ‘आदिपुरुष’ का हवाला देते हुए पैन-इंडिया स्टार प्रभास की कास्टिंग पर भी सीधा वार किया। खन्ना ने तल्ख अंदाज में कहा कि आदिपुरुष में क्या देखने को मिला? वहां प्रभु श्री राम के दिव्य स्वरूप के बीच कुछ नहीं आया, सिर्फ एक भारी मूंछ आ गई। उन्होंने सवाल किया कि क्या हमारे वेदों, पुराणों, वाल्मीकि रामायण या तुलसीदास के रामचरितमानस में कहीं भी भगवान श्री राम का चित्रण उस तरह की मूंछों के साथ मिलता है? हमारे यहां पारंपरिक रूप से भगवान राम का स्वरूप अत्यंत कोमल, सौम्य और मर्यादा से परिपूर्ण माना गया है, जिसमें मूंछों का कोई स्थान नहीं होता। उन्होंने चुटकी लेते हुए कहा कि शायद प्रभास ने अपनी साउथ की इमेज को देखते हुए मूंछें कटवाने से इनकार कर दिया होगा और चूंकि वे इतने बड़े सुपरस्टार हैं, इसलिए असहाय निर्देशक ने सिर झुकाकर उनकी बात मान ली। मुकेश खन्ना ने जोर देकर कहा कि स्टार कितना भी बड़ा क्यों न हो, वह हमारी सनातन आस्था, हमारे आराध्य और हमारे करोड़ों भक्तों की भावनाओं से बड़ा कभी नहीं हो सकता।
अपनी बातचीत के समापन पर मुकेश खन्ना ने बॉलीवुड के निर्देशकों और लेखकों को कड़े शब्दों में चेतावनी देते हुए कहा कि अब देश का दर्शक बदल चुका है और अपनी धार्मिक विरासत को लेकर पूरी तरह सजग है। उन्होंने कहा कि आज का हिंदू बहुत लंबे समय के बाद गहरी नींद से जागा है, अब आप उसे अपनी मर्जी से कुछ भी आधुनिकता का चोला पहनाकर नहीं परोस सकते। उन्होंने सवाल दागा कि क्या आज की नई पीढ़ी या सोशल मीडिया के चंद युवाओं को खुश करने के लिए आप महर्षि वेदव्यास की रचित मूल महाभारत को बदल देंगे? क्या आप अपने पूर्वजों के पवित्र इतिहास को सिर्फ इसलिए विकृत कर देंगे क्योंकि नई पीढ़ी को कुछ फैंसी या वेस्टर्न देखना पसंद है?
उन्होंने एक तीखा उदाहरण देते हुए कहा कि अगर मेरा परदादा उस जमाने में अंग्रेजी टोपी पहनता था या पाश्चात्य डांस करता था और आज के बच्चों को वही पसंद है, तो क्या आप धर्मग्रंथों के भगवानों को भी वही सब कराते हुए दिखाएंगे? अगर आप हमारी समृद्ध परंपरा और करोड़ों लोगों की आस्था के साथ खिलवाड़ किए बिना, पूरी श्रद्धा और प्रामाणिकता के साथ फिल्में बनाएंगे, तो जनता खुद आगे बढ़कर आपकी फिल्म को सिर-आंखों पर बिठाएगी। लेकिन यदि आप मॉडर्न दिखने के नाम पर आस्था का मजाक उड़ाएंगे और जबरन गलत चेहरों को भगवान बनाकर थोपने की कोशिश करेंगे, तो देश की जनता आदिपुरुष की तरह ही हर ऐसी फिल्म को नकारने में एक सेकंड का भी वक्त नहीं लगाएगी।
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