अस्पताल में कैंसर से लड़ रहे थे पिता, वहां कॉमनवेल्थ में इतिहास रच रहा था बेटा ऋषिकांत

खेल की दुनिया में अक्सर ऐसी कहानियां सामने आती हैं जो इंसानी जज्बे और कभी न हार मानने वाली जिद की मिसाल बन जाती हैं। भारतीय वेटलिफ्टर ऋषिकांत ने कॉमनवेल्थ गेम्स के मंच पर सिल्वर मेडल जीतकर न सिर्फ तिरंगे का मान बढ़ाया है, बल्कि मुश्किलों के पहाड़ों को तोड़कर एक नया इतिहास रच दिया है। ऋषिकांत की यह कामयाबी इसलिए सबसे अलग और भावुक करने वाली है क्योंकि जिस वक्त वे अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश के लिए पसीना बहा रहे थे, ठीक उसी समय उनके पिता घर पर अस्पताल के बिस्तर पर कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से जिंदगी की जंग लड़ रहे थे।

मजदूरी के ₹150 और फटे जूते: संघर्षों से भरी शुरुआत

ऋषिकांत का यह सफर किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। एक बेहद साधारण और गरीब परिवार से ताल्लुक रखने वाले ऋषिकांत के घर की माली हालत एक समय इतनी खराब थी कि दो वक्त की रोटी का इंतजाम करना भी दूभर था। उनके पिता परिवार का पेट पालने के लिए रोजाना महज ₹150 की दिहाड़ी पर मजदूरी किया करते थे। खेल के लिए जरूरी महंगी डाइट, प्रोटीन और अच्छे जूते तो दूर की बात थी, ऋषिकांत ने कई बार फटे जूतों और आधे पेट रहकर ही अपनी ट्रेनिंग पूरी की। संसाधनों की इस भारी कमी के बावजूद उनके भीतर का खिलाड़ी कभी कमजोर नहीं पड़ा।

जब घर पर टूटा दुखों का पहाड़: पिता की बीमारी और मेडल की जिद

ऋषिकांत जब अपनी खेल प्रतिभा के दम पर राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना रहे थे और कॉमनवेल्थ गेम्स की तैयारियों में जुटे थे, तभी परिवार पर दुखों का सबसे बड़ा पहाड़ टूट पड़ा। उनके पिता को कैंसर होने की पुष्टि हुई। इलाज के महंगे खर्च और पिता की नाजुक हालत ने ऋषिकांत को भीतर से तोड़ दिया था। एक तरफ पिता को उनकी जरूरत थी, तो दूसरी तरफ देश के लिए मेडल जीतने का उनका सालों पुराना सपना था। ऐसे कठिन समय में उनके पिता ने ही उन्हें ढांढस बंधाया और देश के लिए खेलने भेजने का फैसला किया।

रिंग में ऋषिकांत का पराक्रम: देश को दिलाया चांदी का तमगा

कॉमनवेल्थ गेम्स के उस ऐतिहासिक मुकाबले में जब ऋषिकांत पोडियम पर उतरे, तो उनके दिमाग में सिर्फ एक ही बात चल रही थी— अपने पिता का संघर्ष और देश की उम्मीदें। हर एक लिफ्ट के साथ उन्होंने अपनी जिंदगी के सारे दर्दों को ताकत में बदल दिया। जैसे ही उन्होंने सिल्वर मेडल पर कब्जा जमाया, पूरा स्टेडियम तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। पदक जीतने के बाद ऋषिकांत अपने आंसू नहीं रोक पाए और उन्होंने इस मेडल को सीधे तौर पर अपने पिता के नाम समर्पित किया, जिन्होंने ₹150 की दिहाड़ी मजदूरी करके भी उनके सपनों को कभी मरने नहीं दिया।