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अस्पताल जाने से पहले अब साफ दिखेगा इलाज का खर्च: केंद्र सरकार ने जारी किया बड़ा निर्देश; रिसेप्शन और वेबसाइट पर रेट लिस्ट प्रदर्शित करना हुआ अनिवार्य

देश के निजी और कॉरपोरेट अस्पतालों में इलाज के नाम पर होने वाली कथित मनमानी और डिस्चार्ज के समय थमाए जाने वाले भारी-भरकम, अप्रत्याशित बिलों से जूझ रहे करोड़ों मरीजों और उनके परिजनों के लिए केंद्र सरकार ने एक युगांतरकारी कदम उठाया है। केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को सख्त आधिकारिक दिशा-निर्देश जारी करते हुए स्पष्ट निर्देश दिया है कि सभी अस्पतालों, नर्सिंग होम्स और क्लीनिकों को अपने यहां दी जाने वाली सभी स्वास्थ्य सेवाओं, ओपीडी, जांच, बेड चार्ज और सर्जिकल पैकेजों की आधिकारिक रेट लिस्ट (Rate Chart) को सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करना अनिवार्य किया जाए। इस कदम का सीधा उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मरीज या उसके तीमारदार अस्पताल में भर्ती होने या इलाज शुरू कराने से पहले ही संभावित वित्तीय खर्च को पूरी तरह समझ सकें और किसी भी तरह के वित्तीय धोखे या बाद में होने वाले विवादों से बच सकें।

स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा ‘क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट्स (पंजीकरण और विनियमन) अधिनियम’ के प्रावधानों को कड़ाई से लागू करने के लिए जारी निर्देश में निम्नलिखित बिंदु रेखांकित किए गए हैं:

  1. रिसेप्शन और बिलिंग काउंटर पर रेट बोर्ड: अस्पताल के मुख्य प्रवेश द्वार, रिसेप्शन, ओपीडी प्रतीक्षा क्षेत्र और बिलिंग काउंटरों पर बड़े और स्पष्ट अक्षरों में रेट लिस्ट का डिजिटल या भौतिक डिस्प्ले बोर्ड लगाना होगा।

  2. स्थानीय और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में जानकारी: दरों की सूची केवल अंग्रेजी में नहीं, बल्कि राज्य की स्थानीय/क्षेत्रीय भाषा (जैसे उत्तर भारत में हिंदी) में भी प्रदर्शित की जानी चाहिए ताकि आम नागरिक भी दरों को आसानी से पढ़ और समझ सकें।

  3. डिजिटल माध्यम और वेबसाइट पर सार्वजनिक सूची: अस्पतालों को अपनी आधिकारिक वेबसाइट और मोबाइल ऐप पर भी सभी जांचों, कंसल्टेशन फीस और प्रोसीजरल पैकेजों का विवरण पीडीएफ या सर्च करने योग्य प्रारूप में सार्वजनिक करना होगा।

  4. विदेशी मरीजों के पैकेज रेट्स का भी प्रकटीकरण: मेडिकल टूरिज्म के तहत भारत आने वाले अंतरराष्ट्रीय मरीजों से ली जाने वाली दरों और पैकेज लागत को भी स्पष्ट रूप से घोषित करना होगा, जिससे भारत की स्वास्थ्य प्रणाली में वैश्विक पारदर्शिता बनी रहे।

नियमों के तहत अब अस्पताल किसी भी सेवा के नाम पर “अनपेक्षित” या “अघोषित” शुल्क नहीं जोड़ सकेंगे। प्रदर्शित की जाने वाली सूची में मुख्य रूप से शामिल होंगे:

  • कंसल्टेशन व विजिट शुल्क: सामान्य चिकित्सक (General Physician), विशेषज्ञ (Specialist) और सुपर-स्पेशलिस्ट डॉक्टरों की ओपीडी व आईपीडी विजिट फीस।

  • बेड व आईसीयू चार्ज: सामान्य वार्ड, सेमी-प्राइवेट, प्राइवेट रूम, डे-केयर, एचडीयू और आईसीयू/सीसीयू (ICU/CCU) का दैनिक किराया और नर्सिंग चार्ज।

  • डायग्नोस्टिक्स व पैथोलॉजी: ब्लड टेस्ट, बायोप्सी, एक्स-रे, अल्ट्रासाउंड, सीटी स्कैन और एमआरआई (MRI) जैसी नियमित जांचों की निश्चित दरें।

  • सर्जिकल और मेडिकल पैकेज: सामान्य सर्जरी जैसे मोतियाबिंद, हर्निया, अपेंडिक्स, सिजेरियन डिलीवरी से लेकर एंजियोप्लास्टी, बाईपास सर्जरी, हिप/नी रिप्लेसमेंट आदि के स्टैंडर्ड पैकेज रेट्स।

अक्सर गंभीर बीमारी या आपातकाल की स्थिति में परिजन आनन-फानन में मरीज को किसी निजी अस्पताल में भर्ती करा देते हैं, जहां भर्ती के समय खर्च का कोई स्पष्ट खाका नहीं दिया जाता और डिस्चार्ज के समय लाखों का बिल थमा दिया जाता है। इस नए विनियामक प्रावधान से मरीजों को तीन बड़े लाभ मिलेंगे:

  • तुलनात्मक निर्णय लेने की आजादी: मरीज अपनी वित्तीय क्षमता और बीमा कवरेज के अनुसार यह निर्णय ले सकेंगे कि उन्हें किस अस्पताल या किस श्रेणी के कमरे में भर्ती होना है।

  • अचानक बिल शॉक से मुक्ति: पहले से घोषित पैकेज दरों के कारण इलाज के बीच में मनमाने ‘अतिरिक्त खर्च’ जोड़ने की गुंजाइश खत्म होगी।

  • शिकायतों का त्वरित निपटारा: यदि कोई अस्पताल प्रदर्शित दर से अधिक पैसा वसूलता है, तो उपभोक्ता अदालत (Consumer Forum) या राज्य स्वास्थ्य प्राधिकरण के पास शिकायत दर्ज कराने के लिए मरीज के पास ठोस कानूनी आधार उपलब्ध रहेगा।

हालांकि स्वास्थ्य राज्य सूची (State List) का विषय होने के कारण इस आदेश को धरातल पर उतारने की प्राथमिक जिम्मेदारी राज्य सरकारों और उनके स्वास्थ्य विभागों की है। केंद्र ने विशेष रूप से उन 19 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को तत्परता दिखाने को कहा है जिन्होंने क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट्स एक्ट को पहले ही अंगीकार कर रखा है। विशेषज्ञों का मानना है कि दवाओं की ट्रेड मार्जिन कैपिंग और उच्चतम न्यायालय द्वारा सस्ती स्वास्थ्य सेवाओं पर बढ़ती सख्ती के बीच केंद्र का यह निर्देश स्वास्थ्य तंत्र में व्यावसायिक लूट पर अंकुश लगाने और स्वास्थ्य सेवाओं को वास्तविक रूप से ‘मरीज-केंद्रित’ बनाने की दिशा में एक बड़ा और निर्णायक मोड़ साबित होगा।