
यूएस ग्रीन कार्ड को लेकर भारतीय प्रोफेशनल्स के लिए बड़ी और बुरी खबर सामने आई है, जहां अमेरिकी वीजा बुलेटिन के अनुसार ईबी-2 (EB-2) कैटेगरी पूरी तरह ‘अनअवेलेबल’ हो चुकी है।
अमेरिका में सालों से परमानेंट रेजिडेंसी यानी ग्रीन कार्ड पाने का सपना देख रहे लाखों भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स, वैज्ञानिकों और उच्च कुशल कर्मचारियों के लिए एक बहुत ही निराशाजनक खबर सामने आई है। अमेरिकी विदेश विभाग (U.S. Department of State) और आव्रजन विभाग द्वारा जारी किए गए आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, भारतीय नागरिकों के लिए रोजगार-आधारित दूसरी श्रेणी यानी ईबी-2 (EB-2 – Employment-Based Second Preference) कैटेगरी को फिलहाल पूरी तरह से ‘अनअवेलेबल’ (Unavailable) यानी अनुपलब्ध घोषित कर दिया गया है। इस स्थिति का मतलब यह है कि चालू वित्त वर्ष के लिए इस श्रेणी के तहत तय किए गए कोटे के सारे वीजा पूरी तरह समाप्त हो चुके हैं, जिसकी वजह से अमेरिकी दूतावास या आव्रजन कार्यालय इस कैटेगरी में अब अगले आदेश या नए वित्त वर्ष के शुरू होने तक किसी भी नए ग्रीन कार्ड या अप्रवासन वीजा को जारी या स्वीकृत नहीं कर सकते हैं। अमेरिका में काम कर रहे भारतीय वर्कफोर्स के लिए यह झटका इसलिए भी बड़ा है क्योंकि वर्षों से लंबित पेंडिंग फाइलों और भारी-भरकम बैकलॉग के बीच इस प्रकार अचानक श्रेणी का बंद होना उनके सपनों पर एक बहुत बड़ा विराम लगाता हुआ नजर आ रहा है।
इस महत्वपूर्ण और बहुप्रतीक्षित कैटेगरी के अचानक बंद होने और अनअवेलेबल होने के पीछे मुख्य वजह अमेरिकी कानूनों के तहत तय की गई वार्षिक सीमा और देश-वार कोटा प्रणाली (Per-Country Ceiling) है। अमेरिकी आव्रजन नियमों के अनुसार, हर साल रोजगार-आधारित जितने भी ग्रीन कार्ड जारी किए जाते हैं, उनमें से किसी एक देश के नागरिकों को कुल कोटे का केवल 7 प्रतिशत हिस्सा ही मिल सकता है। भारत जैसे विशाल देश से एडवांस्ड डिग्री धारकों और विशेष योग्यताओं वाले प्रोफेशनल्स की संख्या और आवेदन इतने ज्यादा हैं कि यह तयशुदा कोटा निर्धारित समय से बहुत पहले ही पूरी तरह से खत्म हो जाता है। इस वर्ष भी वित्तीय वर्ष की समाप्ति से पहले ही भारत के कोटे के सारे ईबी-2 वीजा नंबर पूरी तरह से एग्जॉस्ट यानी समाप्त हो चुके हैं। इसके अलावा, अन्य देशों द्वारा अप्रयुक्त रहने वाले वीजा नंबरों का लाभ भी इस बार समय पर नहीं मिल पाने के कारण अमेरिकी प्रशासन को मजबूरन इस कैटेगरी को पूरी तरह से बंद या अनअवेलेबल करना पड़ा है, जिससे भारतीय आवेदकों की मुश्किलें कई गुना बढ़ गई हैं।
अमेरिका में एच-1बी वीजा पर काम कर रहे हजारों भारतीय नागरिकों और उनके आश्रित परिवारों के लिए यह स्थिति भारी मानसिक तनाव और अनिश्चितता लेकर आई है। जो प्रोफेशनल्स अपनी परमानेंट रेजिडेंसी यानी ग्रीन कार्ड की प्रक्रिया के अंतिम चरणों में थे, उनकी फाइलें अब पूरी तरह से ठंडे बस्ते में चली गई हैं और तब तक आगे नहीं बढ़ सकतीं जब तक कि नया कोटा शुरू नहीं होता। हालांकि आव्रजन वकीलों और विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि इस स्थिति के बावजूद यूएसिसिस (USCIS) द्वारा फॉर्म आई-485 (Adjustment of Status) की कुछ श्रेणियों के आवेदन स्वीकार करने की प्रक्रिया पर तकनीकी नियम लागू हो सकते हैं, लेकिन अंतिम अप्रूवल के लिए लंबा इंतजार करना ही होगा। इस लंबी प्रतीक्षा और अनिश्चितता के कारण कई कुशल भारतीय कर्मचारी अब अमेरिका के अलावा अन्य देशों के विकल्पों पर भी विचार करने लगे हैं, क्योंकि ग्रीन कार्ड मिलने में लगने वाला यह बेहिसाब समय कई दशकों तक लंबा खींचता जा रहा है।
इस बड़ी प्रशासनिक रोक के बीच भारतीय प्रवासियों और नीति विश्लेषकों की निगाहें अब पूरी तरह से नए वित्त वर्ष और अमेरिकी संसद में होने वाले विधायी सुधारों पर टिकी हुई हैं। चूंकि हर साल 1 अक्टूबर को नए वित्त वर्ष की शुरुआत के साथ ही वार्षिक वीजा सीमाओं और कोटे का नया आवंटन दोबारा रिसेट होता है, इसलिए उम्मीद की जा रही है कि तब जाकर इस कैटेगरी में कुछ राहत मिल सकती है और कट-ऑफ डेट्स आगे बढ़ सकती हैं। इसके साथ ही, आव्रजन सुधारों की मांग उठाने वाले संगठनों का कहना है कि जब तक अमेरिका देश-वार लगने वाली इस 7 प्रतिशत की सीमा को समाप्त नहीं करता या ग्रीन कार्ड की कुल संख्या में बढ़ोतरी नहीं करता, तब तक भारतीय प्रोफेशनल्स को इसी तरह की गंभीर समस्याओं का सामना बार-बार करना पड़ेगा। अमेरिकी श्रम बाजार में अपनी योग्यता का लोहा मनवाने वाले भारतीयों के लिए यह स्थिति एक बार फिर से इस बात की गवाही देती है कि अमेरिकी आव्रजन प्रणाली में बुनियादी बदलाव कितनी बड़ी और तत्काल आवश्यकता बन चुके हैं।
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