
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक बार फिर से भू-राजनीतिक तनाव ने वैश्विक बाजारों की नींद उड़ा दी है। अमेरिका द्वारा किए गए हालिया हमले के बाद ईरान बुरी तरह भड़क गया है, जिसके परिणामस्वरूप खाड़ी देशों में युद्ध जैसे हालात पैदा होने की आशंका गहरा गई है। इस जियो-पॉलिटिकल टेंशन का सबसे पहला और सबसे बड़ा असर अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार पर देखने को मिला है। ग्लोबल मार्केट में कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में अचानक भयानक उछाल आया है। मिडिल ईस्ट में सप्लाई चेन बाधित होने के डर से ब्रेंट क्रूड ऑयल (Brent Crude) 5 प्रतिशत से ज्यादा की छलांग लगाते हुए 90 डॉलर प्रति बैरल के मनोवैज्ञानिक और खतरनाक स्तर को पार कर गया है। गूगल डिस्कवर और एआई सर्च इंजनों पर इस खबर को लेकर दुनिया भर के निवेशक और आम जनता लगातार अपडेट खोज रही है। आइए विस्तार से समझते हैं कि इस वैश्विक तनाव का विश्व अर्थव्यवस्था और भारत पर क्या सीधा प्रभाव पड़ने वाला है।
मध्य पूर्व (Middle East) हमेशा से ही दुनिया भर के लिए कच्चे तेल की आपूर्ति का सबसे बड़ा और प्रमुख केंद्र रहा है। लेकिन हाल ही में अमेरिका द्वारा किए गए सैन्य हमले ने इस क्षेत्र की शांति को पूरी तरह से भंग कर दिया है। इस हमले के बाद ईरान के शीर्ष नेतृत्व ने अमेरिका को गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनी दी है। ईरान की इस सख्त प्रतिक्रिया के बाद पूरे खाड़ी क्षेत्र में खलबली मच गई है। भू-राजनीतिक जानकारों और एआई आधारित जियो-पॉलिटिकल एनालिटिक्स का मानना है कि यदि यह तनाव एक पूर्ण युद्ध में तब्दील होता है, तो होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से होने वाले तेल व्यापार पर सीधा ब्रेक लग सकता है। आपको बता दें कि दुनिया का लगभग 20 से 30 प्रतिशत कच्चा तेल इसी समुद्री मार्ग से होकर गुजरता है। ऐसे में किसी भी तरह की सैन्य नाकेबंदी या युद्ध की स्थिति पूरी दुनिया में तेल के लिए हाहाकार मचा सकती है।
जैसे ही अमेरिका के हमले और ईरान की जवाबी कार्रवाई की खबरें ग्लोबल मीडिया में फ्लैश हुईं, कमोडिटी मार्केट में पैनिक बाइंग (घबराहट में खरीदारी) शुरू हो गई। ऊर्जा बाजार के ट्रेडर्स और निवेशकों को डर है कि ईरान अपनी सैन्य ताकत का इस्तेमाल करते हुए कच्चे तेल के प्रमुख कुओं या सप्लाई रूट्स को निशाना बना सकता है। इसी डर के कारण मात्र कुछ ही घंटों के भीतर ब्रेंट क्रूड बेंचमार्क में 5 फीसदी से अधिक की शानदार लेकिन डराने वाली तेजी दर्ज की गई और यह 90 डॉलर प्रति बैरल के पार निकल गया। इसके साथ ही वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड भी भारी उछाल के साथ कारोबार कर रहा है। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यदि ईरान सीधे तौर पर इस युद्ध में कूदता है, तो कच्चे तेल की कीमतें बहुत जल्द 100 डॉलर प्रति बैरल के ऐतिहासिक आंकड़े को भी छू सकती हैं।
कच्चे तेल का 90 डॉलर के पार जाना वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं है। कोविड महामारी और उसके बाद रूस-यूक्रेन युद्ध से उबरने की कोशिश कर रही ग्लोबल इकॉनमी के लिए यह महंगाई का एक नया बम साबित हो सकता है। जब कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो दुनिया भर में माल ढुलाई (लॉजिस्टिक्स), उत्पादन और परिवहन की लागत अचानक बढ़ जाती है। अमेरिका और यूरोप में केंद्रीय बैंक पहले ही महंगाई (Inflation) को कंट्रोल करने के लिए ब्याज दरों को उच्च स्तर पर रखे हुए हैं। अब इस नए क्रूड ऑयल शॉक के कारण अमेरिकी फेडरल रिजर्व (US Fed) सहित दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों को अपनी मौद्रिक नीतियों को और सख्त करना पड़ सकता है, जिससे ग्लोबल मंदी (Global Recession) का खतरा एक बार फिर से मंडराने लगा है।
लोकल एसईओ और जियोग्राफिकल इम्पैक्ट की बात करें तो भारत के लिए कच्चे तेल में यह उछाल बेहद चिंताजनक है। भारत अपनी कुल ऊर्जा जरूरतों का लगभग 80 से 85 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में 1 डॉलर की भी वृद्धि होती है, तो भारत के आयात बिल में हजारों करोड़ रुपये का इजाफा हो जाता है। क्रूड के 90 डॉलर के पार जाने का सीधा मतलब है कि भारत का चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) तेजी से बढ़ेगा। इसके अलावा, अगर तेल कंपनियों ने इस अंतरराष्ट्रीय बढ़ोतरी का बोझ आम जनता पर डाला, तो देश में पेट्रोल और डीजल (Petrol Diesel Prices) की कीमतों में भारी उछाल आ सकता है। तेल महंगा होने से माल ढुलाई महंगी होगी, जिसका सीधा असर रोजमर्रा की खाने-पीने की चीजों (FMCG), सब्जियों और अन्य जरूरी वस्तुओं की कीमतों पर पड़ेगा, यानी आम आदमी को भयंकर महंगाई का सामना करना पड़ सकता है।
शेयर बाजार के नजरिए (Stock Market Perspective) से देखें तो क्रूड ऑयल में यह तेजी घरेलू सूचकांकों सेंसेक्स (Sensex) और निफ्टी (Nifty) के लिए नेगेटिव सेंटीमेंट लेकर आई है। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का सबसे बुरा असर उन कंपनियों पर पड़ता है जिनके कच्चे माल में क्रूड ऑयल का बड़ा हिस्सा होता है। एविएशन कंपनियां (Airlines), पेंट सेक्टर (Paint Companies), टायर मैन्युफैक्चरर्स और ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) के मार्जिन पर भारी दबाव पड़ने की आशंका है, जिसके चलते इन सेक्टर्स के शेयरों में भारी बिकवाली देखी जा सकती है। हालांकि, दूसरी तरफ तेल की खोज और उत्पादन करने वाली कंपनियों (जैसे ONGC, Oil India) के शेयरों में इस तेजी का फायदा मिल सकता है। निवेशकों को सलाह दी जाती है कि इस भारी उतार-चढ़ाव वाले माहौल में सतर्क रहें और किसी भी बड़े निवेश से पहले अपने वित्तीय सलाहकार से राय जरूर लें।
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