
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में एक बार फिर बड़ी गिरावट देखने को मिली है। अमेरिका और ईरान के बीच पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव के बीच वैश्विक स्तर पर तेल की मांग कमजोर होने की आशंका और प्रमुख एजेंसियों द्वारा डिमांड के अनुमानों में कटौती किए जाने के कारण क्रूड ऑयल के दाम फिसल गए हैं। बाजार के जानकारों का मानना है कि मांग घटने के इन अनुमानों से कीमतों पर दवाब बढ़ा है, हालांकि भू-राजनीतिक उथल-पुथल के कारण बाजार में अभी भी जोरदार उतार-चढ़ाव बना हुआ है।
वैश्विक मांग घटने की आशंका और प्रमुख रिपोर्ट
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में सुस्ती और आर्थिक सुस्ती के संकेतों के चलते विभिन्न रिपोर्टों में कच्चे तेल की मांग के अनुमानों को कम किया गया है। ओपेक (OPEC) और इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) जैसी बड़ी संस्थाओं ने आने वाले महीनों में वैश्विक तेल खपत की रफ्तार धीमी रहने की बात कही है। विश्लेषकों का कहना है कि दुनिया भर में ईंधन की ऊंची कीमतों और सप्लाई चेन की बाधाओं के कारण खपत प्रभावित हुई है, जिसके चलते ब्रेंट क्रूड और अमेरिकी बेंचमार्क डब्ल्यूटीआई (WTI) के दामों में एक डॉलर से अधिक की गिरावट दर्ज की गई है। ब्रेंट क्रूड फिसलकर करीब 87-88 डॉलर प्रति बैरल के आसपास आ गया है, जबकि WTI क्रूड भी गिरकर 82-83 डॉलर के दायरे में कारोबार कर रहा है।
अमेरिका-ईरान तनाव और सप्लाई का संकट
दूसरी ओर, अमेरिका और ईरान के बीच कूटनीतिक वार्ताओं और हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को लेकर अनिश्चितता का दौर जारी है। पश्चिम एशिया के इस संवेदनशील मार्ग से होने वाली तेल आपूर्ति को लेकर निवेशकों की चिंताएं पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं। हालांकि अमेरिका में कमर्शियल क्रूड इन्वेंट्री (कच्चे तेल के भंडार) में हुई बढ़ोतरी के आंकड़ों ने भी कीमतों पर दबाव बनाने का काम किया है। जानकारों का कहना है कि एक तरफ जहां भू-राजनीतिक तनाव कीमतों को नीचे गिरने से रोक रहा है, वहीं दूसरी कमजोर मांग के अनुमान दामों को नीचे खींच रहे हैं।
आम जनता और बाजार पर इसका क्या होगा असर
कच्चे तेल की कीमतों में नरमी आने से भारत जैसे आयातक देशों के लिए राहत की उम्मीद बंधती है, जो अपनी कुल जरूरत का अधिकांश हिस्सा विदेशों से आयात करते हैं। यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल के दाम लंबे समय तक कम बने रहते हैं, तो घरेलू स्तर पर पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर भी इसका सकारात्मक असर देखने को मिल सकता है। हालांकि, जानकारों का यह भी मानना है कि मिडिल ईस्ट के हालात इतनी जल्दी सामान्य होने के आसार नहीं हैं, इसलिए तेल बाजार में यह उतार-चढ़ाव आगे भी बना रह सकता है।
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