अब सिर्फ विकलांगता नहीं, डॉक्टर बनने के लिए परखी जाएगी छात्र की ‘रियल कैपेसिटी’, NMC का बड़ा फैसला

देश के मेडिकल एजुकेशन सिस्टम में एक बेहद क्रांतिकारी और व्यावहारिक बदलाव लागू होने जा रहा है। नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) ने एमबीबीएस (MBBS) कोर्सेस में दाखिला लेने वाले दिव्यांग (PWD) छात्रों के लिए नियमों में बड़ा संशोधन किया है। अभी तक मेडिकल कॉलेजों में एडमिशन के दौरान केवल बेंचमार्क डिसेबिलिटी यानी दिव्यांगता के तय प्रतिशत (Percentage of Disability) को ही मुख्य पैमाना माना जाता था। लेकिन अब नए और आधुनिक दिशानिर्देशों के तहत यह तय किया गया है कि सिर्फ कागजी विकलांगता प्रतिशत नहीं देखा जाएगा, बल्कि यह परखा जाएगा कि संबंधित छात्र के पास डॉक्टर बनने और अस्पताल में मरीजों का इलाज करने की वास्तविक क्षमता (Real Functional Capacity) है या नहीं।

क्या है NMC का नया असेसमेंट क्राइटेरिया और इसका उद्देश्य

नेशनल मेडिकल कमीशन द्वारा जारी किए गए इन नए दिशा-निर्देशों का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मेडिकल की कठिन और चुनौतीपूर्ण पढ़ाई पूरी करने के बाद जब कोई छात्र डॉक्टर बने, तो वह अस्पताल की इमरजेंसी, सर्जरी और वार्ड्स में बिना किसी शारीरिक बाधा के अपनी जिम्मेदारी निभा सके। कई बार कम विकलांगता वाले छात्र भी प्रैक्टिकल तौर पर मरीजों को संभालने में कठिनाई महसूस करते हैं, जबकि कई बार आधुनिक असिस्टिव डिवाइसेज (सहायक उपकरणों) की मदद से छात्र असाधारण प्रदर्शन कर सकते हैं। इसी व्यावहारिक पक्ष को ध्यान में रखते हुए अब देश भर के चुनिंदा डिसेबिलिटी असेसमेंट सेंटर्स को अधिक अधिकार दिए गए हैं जो वैज्ञानिक तरीकों से छात्र की कार्यकुशलता का मूल्यांकन करेंगे।

छात्रों और मेडिकल एक्सपर्ट्स के बीच छिड़ी नई बहस

एनएमसी के इस नए फैसले के सामने आने के बाद देश भर के मेडिकल छात्रों, अभिभावकों और डॉक्टरों के बीच बहस छिड़ गई है। एक तरफ जहां कई विशेषज्ञों का मानना है कि चिकित्सा पेशा सीधे तौर पर इंसानी जिंदगी से जुड़ा हुआ है, इसलिए मरीजों की सुरक्षा और डॉक्टर की ऑपरेशनल क्षमता से किसी भी तरह का समझौता नहीं किया जाना चाहिए। वहीं दूसरी तरफ, दिव्यांग अधिकारों के लिए काम करने वाले कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह नियम कई मेधावी और योग्य छात्रों के सपनों पर ब्रेक लगा सकता है। हालांकि, आयोग ने यह भी स्पष्ट किया है कि आधुनिक तकनीकों और प्रोस्थेटिक्स का इस्तेमाल करने वाले छात्रों को पूरी राहत दी जाएगी यदि वे अपनी कार्यक्षमता साबित कर देते हैं।

स्थानीय मेडिकल कॉलेजों और एडमिशन प्रक्रिया पर असर

भौगोलिक और स्थानीय (Geographical Optimization) स्तर पर देश के तमाम सरकारी और निजी मेडिकल कॉलेजों (Medical Colleges) के एडमिशन बोर्ड्स को इन नए नियमों के तहत अपनी स्क्रीनिंग प्रक्रियाओं को और अधिक पारदर्शी बनाना होगा। काउंसलिंग के दौरान गठित होने वाले मेडिकल बोर्ड अब ज्यादा गहराई से छात्रों के फिजिकल फिटनेस और एप्टीट्यूड की जांच करेंगे। इसका सीधा असर नीट (NEET UG) काउंसलिंग के दौरान उन छात्रों पर पड़ेगा जो विकलांगता कोटे के तहत एमबीबीएस में सीट पाने की उम्मीद लगाए बैठे रहते हैं।

एआई सर्च और आधुनिक जनरेटिव ऑप्टिमाइजेशन के मायने

आधुनिक जनरेटिव इंजन ऑप्टिमाइजेशन (AI सर्च) और डिजिटल एजुकेशन ट्रेंड्स के दौर में इस तरह के नीतिगत बदलाव छात्रों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो जाते हैं। नीट और मेडिकल करियर से जुड़े युवा अब इस बात को लेकर ज्यादा जागरूक हो रहे हैं कि सिर्फ थ्योरी की पढ़ाई पास करना ही काफी नहीं है, बल्कि मेडिकल प्रैक्टिस की डिजिटल और फिजिकल डिमांड्स को पूरा करना भी उतना ही जरूरी है। एनएमसी का यह कदम जहां एक तरफ मेडिकल स्टैंडर्ड्स को और मजबूत करेगा, वहीं दूसरी तरफ छात्रों को अपनी क्षमताओं को और अधिक निखारने के लिए प्रेरित करेगा।