Share Market June 2026: साल के 5 महीने रहे पस्त, अब जून में इन 5 बड़े फैक्टर्स से तय होगी शेयर बाजार की किस्मत; दांव लगाने से पहले पढ़ें यह रिपोर्ट

मुंबई, बिजनेस डेस्क। साल 2026 अब अपने आधे सफर पर पहुंच चुका है, लेकिन शेयर बाजार के लिहाज से शुरुआती पांच महीने निवेशकों के लिए बेहद निराशाजनक और सुस्त रहे हैं। लगातार उतार-चढ़ाव झेल रहे निवेशकों के लिए अब जून 2026 का महीना बेहद निर्णायक साबित होने वाला है। इस महीने डोमेस्टिक और ग्लोबल लेवल पर कई ऐसी बड़ी घटनाएं और घोषणाएं होने जा रही हैं, जो सीधे तौर पर दलाल स्ट्रीट (Dalal Street) का मूड और दिशा तय करेंगी।

महीने की शुरुआत जहां 3 से 5 जून के बीच होने वाली भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की हाई-प्रोफाइल पॉलिसी मीटिंग से होगी, वहीं भारत-अमेरिका ट्रेड डील को लेकर भी इसी हफ्ते बड़ी घोषणा होने की उम्मीद है। इसके अलावा मानसून की चाल और अमेरिकी केंद्रीय बैंक (US Fed) के फैसले भी बाजार की चाल को प्रभावित करेंगे। आइए विस्तार से समझते हैं उन 5 अहम फैक्टर्स को, जिन पर इस महीने हर निवेशक की नजर रहेगी।

1. आरबीआई एमपीसी बैठक: क्या गवर्नर संजय मल्होत्रा देंगे ब्याज दरों में राहत?

इस महीने का सबसे पहला और बड़ा ट्रिगर भारतीय रिजर्व बैंक की मॉनेटरी पॉलिसी कमिटी (MPC) की बैठक है, जो 3 जून से 5 जून 2026 तक चलेगी। बैठक के आखिरी दिन यानी शुक्रवार, 5 जून को आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा नीतिगत फैसलों और महंगाई के नए अनुमानों की घोषणा करेंगे। यह ऐलान न केवल शेयर बाजार की दिशा तय करेगा, बल्कि पूरी भारतीय अर्थव्यवस्था की रफ्तार को भी प्रभावित करेगा।

  • बाजार की उम्मीद: अधिकांश इकोनॉमिस्ट और मार्केट एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस बार बेंचमार्क रेपो रेट (Repo Rate) में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा और यह 5.25% पर स्थिर रह सकती है। आपको बता दें कि आखिरी बार रेपो रेट में दिसंबर 2025 में बदलाव हुआ था, जिसके बाद 2026 की फरवरी और अप्रैल की बैठकों में इसे यथावत रखा गया। हालांकि, इस बार पॉलिसी का रुख ‘न्यूट्रल’ से बदलकर थोड़ा सख्त या सतर्क हो सकता है और साल के अंत तक दरों में बढ़ोतरी की आशंका भी जताई जा रही है।

2. मानसून की चाल: देरी और कमजोरी की आशंका ने बढ़ाई निवेशकों की चिंता

भारतीय अर्थव्यवस्था और शेयर बाजार के लिए मानसून लाइफलाइन की तरह है। मौसम विभाग (IMD) के शुरुआती अनुमानों के मुताबिक, इस साल मानसून के कुछ कमजोर रहने की आशंका जताई जा रही है। आमतौर पर मई के आखिरी हफ्ते में दस्तक देने वाला मानसून इस बार कुछ देरी से चल रहा है। जून के पूरे महीने निवेशकों की नजर मानसून की प्रोग्रेस रिपोर्ट पर टिकी रहेगी, क्योंकि इसमें देरी या कमजोरी सीधे तौर पर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुस्त कर सकती है और देश में महंगाई (Inflation) को दोबारा भड़का सकती है।

3. भारत-अमेरिका ट्रेड डील: एक्सपोर्ट से जुड़े सेक्टर्स को मिल सकता है बड़ा बूस्टर

भारत और अमेरिका के बीच लंबे समय से पेंडिंग पड़ी ट्रेड डील अब अपने अंतिम चरण में पहुंचती दिख रही है। 1 जून से नई दिल्ली में दोनों देशों के बड़े नीति निर्माताओं और वार्ताकारों के बीच 4 दिनों की एक बेहद अहम बैठक शुरू हो रही है। बाजार को उम्मीद है कि इस बैठक के खत्म होने के बाद जून में ही इस मेगा ट्रेड डील को लेकर कोई ऐतिहासिक घोषणा हो सकती है। अगर यह डील फाइनल होती है, तो यह भारतीय शेयर बाजार और खासकर एक्सपोर्ट-ओरिएंटेड (निर्यात आधारित) कंपनियों के लिए एक बड़ा इकोनॉमिक बूस्टर साबित होगी।

4. होर्मुज जलडमरूमध्य पर फैसला: ईरान-अमेरिका के रुख पर टिकी दुनिया की नजरें

वैश्विक भू-राजनीतिक (Geopolitical) मोर्चे पर यह इस महीने का सबसे संवेदनशील फैक्टर है। हालांकि अभी तक ईरान और अमेरिका के बीच किसी तरह की आधिकारिक डील पर मुहर नहीं लगी है, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान को 300 अरब डॉलर का ‘रिकंस्ट्रक्शन फंड’ ऑफर किए जाने के बाद समझौते की उम्मीदें काफी बढ़ गई हैं। इसके बावजूद, दोनों देशों की तरफ से अभी तक पूरी तरह से सकारात्मक संकेत नहीं मिले हैं, जिसके चलते कच्चे तेल के बाजार और ग्लोबल इन्वेस्टर्स के बीच सतर्कता का माहौल बना हुआ है।

5. यूएस फेड मीटिंग: नए चेयरमैन केविन वार्श के पहले फैसले पर टिकी निगाहें

अमेरिकी केंद्रीय बैंक (US Fed) की पॉलिसी मीटिंग 16-17 जून 2026 को होने जा रही है। अमेरिका में इस समय बढ़ती महंगाई और बेरोजगारी दर सबसे बड़े आर्थिक मुद्दे बने हुए हैं। खास बात यह है कि डोनाल्ड ट्रंप के हैंड-पिक्ड (पसंदीदा) सलेक्शन माने जाने वाले नए फेड चेयरमैन केविन वार्श की कप्तानी में यह पहली फेड मीटिंग होगी। अब पूरी दुनिया यह देखने को उत्सुक है कि क्या वार्श राष्ट्रपति ट्रंप की इच्छानुसार ब्याज दरों में कटौती का तोहफा देते हैं या फिर अमेरिकी महंगाई के आंकड़ों को देखते हुए सख्त रुख अपनाते हुए रेट हाइक (दरों में बढ़ोतरी) का फैसला लेते हैं।