
News India Live, Digital Desk : बिहार की राजनीति में कब क्या हो जाए, यह समझना बड़े-बड़े जानकारों के लिए भी चुनौती रहता है। लेकिन इन दिनों जो खबर पटना की सड़कों से लेकर दिल्ली के गलियारों तक गूंज रही है, वह किसी बड़े सियासी धमाके से कम नहीं है। मुद्दा है मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को ‘भारत रत्न’ देने की मांग। यह बात सिर्फ जेडीयू के भीतर से ही नहीं उठ रही, बल्कि अब एनडीए (NDA) के कद्दावर नेता और पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने भी इस सुर में सुर मिला दिया है।आखिर जीतन राम मांझी ने क्या कहा?अभी हाल ही में केसी त्यागी ने नीतीश कुमार के लिए देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान की मांग की थी। इसके तुरंत बाद केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने उनका समर्थन करते हुए कहा कि, “अगर किसी ने वाकई ज़मीनी स्तर पर गरीबों, दलितों और पिछड़ों की तकदीर बदलने का काम किया है, तो वे नीतीश कुमार ही हैं।” मांझी का तर्क है कि जिस तरह उन्होंने महिला सशक्तीकरण (छात्राओं को साइकिल, वर्दी) और सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ लड़ाई लड़ी है, उसके बाद वे भारत रत्न के प्रबल दावेदार हैं।सिर्फ काम नहीं, संदेश भी है गहरादेखा जाए तो ये केवल एक मांग नहीं है, बल्कि बिहार में बदलती राजनीतिक केमिस्ट्री का हिस्सा भी हो सकता है। जीतन राम मांझी और नीतीश कुमार का रिश्ता इतिहास में उतार-चढ़ाव भरा रहा है। ऐसे में मांझी का इस कदर नीतीश के समर्थन में खड़ा होना बताता है कि इस बार गठबंधन के भीतर का तालमेल काफी मज़बूत है।क्या कहती है आम जनता और विपक्षी खेमा?जहां जेडीयू और हम (HAM) समर्थक इसे ‘सम्मान’ का मुद्दा बता रहे हैं, वहीं विपक्षी पार्टियां इसे चुनावी स्टंट की तरह देख रही हैं। सोशल मीडिया पर भी बहस छिड़ गई है। कोई कहता है कि बिहार को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में नीतीश कुमार का योगदान वाकई सराहनीय है, तो कोई इसे पुरानी फाइलों के खोलकर अपनी दावेदारी मज़बूत करने की कोशिश बता रहा है।क्यों उठ रही है ये मांग बार-बार?नीतीश कुमार के समर्थक उनके द्वारा किए गए शराबबंदी, जल-जीवन-हरियाली और महिला रिजर्वेशन जैसे साहसिक फैसलों को उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि बताते हैं। उनका कहना है कि दशकों तक सत्ता में रहकर किसी नेता का बेदाग़ रहना (Corruption-free) खुद में एक मिसाल है और इसी आधार पर उन्हें यह गौरव मिलना चाहिए।आगे क्या होगा?भारत रत्न का फैसला सरकार और उसकी विशेष कमेटियां करती हैं, लेकिन जिस तरह से बिहार के बड़े-बड़े दिग्गज नेता इस मुहिम में शामिल हो रहे हैं, उससे केंद्र सरकार पर भी एक मनोवैज्ञानिक दबाव ज़रूर बढ़ेगा। क्या 2026 की राजनीति में यह मांग कोई नया रंग दिखाएगी? क्या ‘विकास पुरुष’ कहे जाने वाले नीतीश बाबू को वाकई ये सम्मान मिलेगा?वक्त और दिल्ली के फैसले ही इसका जवाब देंगे, लेकिन फिलहाल बिहार में इस खबर ने सबको ‘चौकन्ना’ ज़रूर कर दिया है।
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