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कहीं आप भी तो नहीं ‘जूम फैटीग’ के शिकार, जानें क्या हैं लक्षण और बचाव

कोरोनाकाल में वीडियो कॉलिंग का इस्तेमाल करना जरूरत ही नहीं, मजबूरी भी है। पढ़ाई-लिखाई हो या ऑफिस का काम, अपनों के संपर्क में रहना हो या फिर चिकित्सकीय सलाह लेनी हो, वीडियो कॉल ही सबसे आसान और उपयुक्त जरिया नजर आता है।

हालांकि, बीते दस महीने से दिन में घंटों वीडियो कॉल से जुड़े रहने के कारण लोग ‘जूम फैटीग’ का भी शिकार हो रहे हैं। उन्हें अपनी जिंदगी एक छोटी स्क्रीन तक सिमटती नजर आ रही है। मानव स्पर्श और आत्मीय संवाद की कमी के चलते वे अकेलेपन व बेचैनी के एहसास से घिरने लगे हैं।

यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन (यूसीएल) के मनोवैज्ञानिकों ने कहा कि ‘जूम फैटीग’ न सिर्फ मानसिक, बल्कि शारीरिक स्वास्थ्य पर भी कहर बरपा रहा है। भारत में जूम की मुख्य संचालन अधिकारी खुद इस समस्या से अछूती नहीं हैं।

हालांकि, वह इसमें कंपनी का कोई दोष नहीं मानतीं। अलबत्ता कहती हैं कि लोगों को खुद स्क्रीन से ब्रेक लेने का समय निकालना पड़ेगा। तन-मन को स्वस्थ एवं खुशहाल रखने के लिए उन्हें दोस्तों-रिश्तेदारों से आत्मीय फोन कॉल करने पर जोर देना होगा।

यूसीएल की शीर्ष मनोवैज्ञानिक सोफी स्कॉट की मानें तो जूम कॉल में हमेशा आमने-सामने का संवाद होता है। इससे व्यक्ति अक्सर बहुत असहज महसूस करता है। यही नहीं, एक-दूसरे को देखने के बावजूद सामने वाले की सांसों या स्पर्श को महसूस न कर पाने के चलते मन में अजब-सी बेचैनी भी पैदा होने लगती है।

यह स्थिति न सिर्फ दिल की सेहत के लिए घातक है, बल्कि याददाश्त, तर्क शक्ति, एकाग्रता और त्वरित फैसले लेने की क्षमता पर भी बुरा असर डालती है। स्कॉट ने ‘जूम फैटीग’ से निपटने के लिए दोस्तों-रिश्तेदारों को नियमित रूप से फोन कॉल करने की हिदायत दी।

बातचीत में उन्होंने पुरानी यादों को ताजा करने और एक-दूसरे की अहमियत बयां करने को कहा, जिससे स्ट्रेस हार्मोन के स्त्राव में कमी आए और फील गुड हार्मोन का उत्पादन बढ़ जाए।

समस्या-
-यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के मनोवैज्ञानिकों ने स्पर्श के अभाव को घातक करार दिया
-स्क्रीन से ब्रेक लेकर दोस्तों-रिश्तेदारों से फोन पर आत्मीय संवाद करने की हिदायत दी

तन-मन पर असर-
-लंबे समय तक एक-दूसरे की आंखों में आंखें डालकर देखने के दबाव के चलते मस्तिष्क कई बार खुद को खतरे में महसूस करने लगता है
-ग्रुप वीडियो कॉल में कई लोगों की मौजूदगी से ध्यान क्षमता प्रभावित होती है, मस्तिष्क भी संवाद डिकोड करने में ज्यादा मशक्कत करता है
-हमेशा सतर्क रहने का तनाव भी मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर डालता है, उत्पादकता में कमी के साथ चिड़चिड़ेपन की शिकायत पनपती है

वीडियो कॉल की मजबूरी-
-10 से 12 घंटे पढ़ाई के लिए वीडियो कॉल पर गुजारने को मजबूर हैं छात्र।
-पेशेवरों ने 01 से चार घंटे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग में शामिल होने की बात कही।
(स्रोत : लोकलसर्किल्स का सर्वे)

समाधान-
1.रोज सुबह 10 से 15 मिनट पार्क में चहलकदमी करें।
2.हरियाली में बैठें, मस्तिष्क को सुकून का एहसास होगा।
3.साइक्लिंग करें, रक्त प्रवाह सुचारु होने से चिड़चिड़ाहट घटेगी।
4.संगीत सुनें, ऐसी दुनिया में पहुंचेंगे जहां खुश-सुरक्षित महसूस करते हैं।
5.तन-मन को भाने वाले काम करें, मीठे और फॉस्टफूड का सेवन घटाएं।

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